Friday, April 6, 2012

लोक मंगल पर अनुरोध

लोक मंगल पर अनुरोध -

इस ब्लाग पर विचारणीय बिंदुओं को चयनित करने का काम अभी भी रुका हुआ है। मौन के समय पहले दिन भाई वागीश जी ने जो लिखा था वह मैं भूल गया हूँ। उन्हे अपनी याददास्त से निकाल कर जोड़ना चाहिए।
पहला प्रश्न यही है कि लोक मंगल से हम क्या समझते हैं? इस बिंदु पर बात की जाय तो फिर हम आगे बढं।

मेरी समझ से -

सभी मनुष्य सुखी रहना चाहते हैं। यह सुख शारीरिक एवं मानसिक (भावना एवं बुद्धि ज्ञान आदि से संबंधित) दोनों का मिलजुला रूप होता है। कहीं शारीरिक तो कही मानसिक पक्ष की   प्रधानता होती है।
सुख का विरोध या अभाव दुख है। इसे लोग पसंद नहीं करते।
सुख की कमी एवं प्रतिकूलता दो मुख्य कारण हैं। ये दोनों ही कारण एक सीमा तक प्राकृतिक हैं। उसके बाद स्वयं मानव के विभिन्न संगठनों/संस्थाओं या परम्पराओं द्वारा उत्पादित एवं संरक्षित हैं। किसी एक ही पक्ष पर आधारित विचार अतिवादी हो जाता है।
इस स्थिति में प्रश्न यह है कि -
1.    वर्त्तमान परिस्थिस्ति में क्या करें कि मानव अधिक से अधिक सुखी रहे और     उसके दुख कम हो ?
2.    पूर्ववर्ती एवं वर्तमान उपाय आज कहाँ तक संगत हैं?
3.    मनुष्य एवं पकृति तथा व्यक्ति एवं समाज राज्य/धर्म/बाजार के बीच की उलझनें क्या हैं और उन्हे कैसे सुलझाएं ?
ऐसा और वर्गीकरण भी हो सकता हैं। उदाहरण के लिये भारत में सुख को दो पंकारों में रखा गया, 1 इस जीव लोक का सुख और 2 पर लोक का सुख।
इस जीव लोक का सुख अर्थात्-
अर्थागमो नित्यम् अरोगिता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च।
वश्यश्च पुत्रो अर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन।।
हे राजन् इस जीवलोक में छे सुख हैं - 1 अर्थ का आगमन, 2 सदैव निरोग रहना, 3 पत्नी का प्रिया प्रेमिका होना या प्रेमिका का पत्नी होना, 4 और उसका प्रिय वचन बोलने वाला होना, 5 पुत्र का अपने वश में होना, 6 विद्या का अर्थकरी होना मतलब आमदनी कराने वाली होना।
यह एक नमूना है। आपलोग भी तो उतरिए।

भाई वागीश जी ने मोबाइल पर हुई चर्चा में पूछा और भाई मधु जी ने ब्लाग पर विचार डाले। मैं भी देख रहा हूं कि बात आगे बढ़ नही रही अतः अपने विचार एवं व्यक्त विचारों अर अपनी समझ प्रस्तुत कर रहा हूं। रवीन्द्र कुमार पाठक

ध्यान क्या है? ध्यान की कौन सी विधि अपनाएँ?

आजकल ध्यान के अनेक प्रकार समाज में प्रचिलित हैं तब अनजान व्यक्ति के मन में यह सहज प्रश्न उठता ही है कि अगर उसे ध्यान करना हो तो वह किस विधि से करे?
कहाँ से सीखे? क्या सही है, क्या गलत?

ध्यान का मतलब -

ध्यान शब्द का कई अर्थों में प्रयोग होता है, और इस मानसिक अभ्यास की अनेक विधियां हैं,  जैसे- एकाग्रता, तटस्थता, कल्पना, चिंता आदि।
ध्यान की विधियां अपनी पद्धति की बनावट एवं लक्ष्य की दृष्टि से मुख्यतः निम्न प्रकार की हैं- इससे आपको चयन करने में सुविधा होगी। मैं ने केवल वास्तविक विधियों का वर्गीकरण किया है, जो प्रचालित ठगी है, उसका क्या वर्गीकरण?

प्रमुख विधियाँ -

तटस्थता प्रधान - शरीर एवं मन में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया, संवेदना चेतना आदि का तटस्थ भाव से अवलोकन करना एवं उन्हे सजगतापूर्वक महसूस करना। अपनी ओर से चयन एवं संकल्प की जगह तटस्थ रहना, जो हो रहा है, उसे होने देना।
इनमें तटस्थता मुख्य है, कभी-कभी अधिक उद्वेग या आलस्य, नींद आदि आने पर उन्हे दूर करने का प्रयास भी किया जाता है -
इसके अन्तर्गत विपश्यना (बौद्ध परमपरा की थेरवाद पालि परम्परा) प्रेक्षा ध्यान (जैन परम्परा) एवं पतंजलि की योग परम्परा की विधियाँ आती हैं।
लक्ष्य -    शरीर एवं मन के संबंधों एवं मन की कार्यप्रणाली का ज्ञान। तटस्थता की दक्षता

एकाग्रता एवं रूपांतरण प्रधान -

चंचल मन को किसी व्यक्ति, बिंब  ध्वनि के प्रति पूरी तरह संवेदनशील एवं एकाग्र बनाकर अपने होने के भान को भी उसी में विलीन कर देना या तादात्म्य बना लेना। इसमें तटस्थता की जगह भावनात्मक लगाव एवं एकाग्रता विकसित की जाती है। यह भक्तिमार्गी श्रद्धामूलक दृष्टिकोण है।
लक्ष्य -    इष्ट अर्थात प्रिय/प्रिया के साथ तादात्मय की अनूमति एवं प्राकृतिक शक्तियों के साथ तादात्म्य स्थापित करने पर सूक्ष्म ध्वनि,संवेदना आदि को महसूस करने तथा उस आधार पर किसी दूसरें मानव या अन्य जीव को सूक्ष्म स्तर पर प्रभावित करने की क्षमता, ंगीत, चित्रकला वाद-विवाद की दक्षता, याददाश्त मजबूत करना आदि। वैदिक भक्तिमार्ग सगुण उपासना, योगवाशिष्ठ धारा एवं बौद्ध माहायान संप्रदाय की विधियों में इसी दृष्टि की प्रधानता रहती है।

 मिश्रित विधियों वाली हठयोग एवं तंत्र की धारा -

पूर्व वर्णित दो धाराओं के समानांतर कुछ लोगों ने सोचा कि किसी एक ही दृष्टिकोण का अनुसरण क्यों करें? मन एवं प्रकृति के बीच अनेक प्रकार के संबंध हैं। अपने काम एवं सामर्थ्य के अनुरूप विधि किसी भी ज्ञानी गुरु के माध्यम से सीख लेनी चाहिए, चाहे वह शरीर की कार्यप्रणाली संबंधी हो, औषधियों का प्रभाव हटाने की हो या शीघ्रता से ध्यान में सफलता के लिए सामाजिक समन्वय की हो, रंग ध्वनि, खाद्य सामग्री द्वारा मन को प्रभावित करने की हो या पशु-पंक्षियों जैसी सूक्ष्म आवाज निकालने की हो।
सबसे मजेदार बात यह कि दुनिया के हर खूँखार जानवर, जैसे नाग, शेर, हाथी, घड़ियाल से दोस्ती करना हो या अपने भीतर की खतरनाक मानी जाने वाली प्रवृतियों को सबसे खतरनाक स्तर पर उभार कर उस पर नियंत्रण पाने की हो अभ्यास की विधियां मौलिक रूप से एक ही तरह की होती हैं, जैसे संसार को ही नहीं संसार को नष्ट करने वाले यम को भी नष्ट करने वाले क्रोध का अभ्यास, संपूर्ण संसार से प्रेम, कामोतेजना के चरम पर घंटों नहीं महीनों रहने का अभ्यास आदि।
जो साधना अकेले करने में, अनुभव तक पहूँचाने में 10, 20 साल लगे वहाँ, उस अनुभव तक  महीने भर में समाज के सहयोग से पहूँचना आदि।
इय धारा में इतनी विविधता और विचित्रता है कि विधियों का चयन एवं अभ्यास या तो कुल परम्परा से होता आ रहा था या गुरू स्वयं शिष्य के अनुरूप विधि का चयन करते थे।
हर क्षेत्र के लोग एक न्यूनतम स्तर तक विधियों का ज्ञान सबके लिए अनिवार्य मानते थे और इतना जबरन भी सिखाया जाता रहा। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी भी विधि की निंदा नहीं करता जबतक वह अपनी नैतिक संहिता से बंधी रहे, जब तक कोई विधि अपनी परम्परा की नैतिकता छोड़कर सुविधा या दिखावा का मार्ग न गढ़ ले।
चूँकि इस शिक्षण में परोक्ष विधियों का उपयोग अधिक होता है अतः धोखेबाजी की शिकायत बनी रहती है।

खतरे -

पहली विधि से -
तटस्थता अगर गहरी नहीं हो, अपने मन की, सुख-दुख की भावना से भी तटस्थत रहने का अभ्यास न हो, केवल सामान्य अनुभूतियों से तटस्थता पलायनवादी प्रवृत्ति में बदल जाती है और दूसरों की समस्या के प्रति असंवेदनशीलता एवं बाहरी तौर पर प्रतिक्रिया करने में ढ़ांेग करने में खूब सहायक होती है। यह ऊपरी सफाई शिष्टाचार तक ही सीमित रह गई। ऐसा आदमी भावुक लोगों को मूर्ख मानता है। यह व्यक्ति प्रधान साधना है। इसमंे समाज नहीं हैं।
दूसरी विधि से -
इससे भावनाएँ किसी एक तरफ बहुत अधिक केन्द्रित की जाती हैं। ध्यान में इष्ट या आलंबन अगर समाज या कोई व्यापक लक्ष्य नहीं हो तो संर्कीणता एवं सांप्रदायिक कट्टरता विकसित होती है। मनुष्य नए ज्ञान के प्रति अत्यंत विरोधी एवं प्रतिक्रियावादी हो जाता है। इस विधि से मानव प्रतिक्रियावादी हो जाता है’.। इस विधि से .मानवबम की तरह मनुष्य विष्फोटक हो जाता है। इस विधि से सघन आत्मीयता और संगठन भावना का विकास तो होता है पर कई बार तीव्र घृणा  और असहिष्णुता भी विकसित होती है। फिर भी तीन चार तरह के आलंबनों पर ध्यान के अभ्यास से मनुष्य समझदार हो जाता है कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। तब उपर्युक्त समस्याएं नहीं रहतीं।
तीसरी विधि -
यह विधि जहाँ तक समाज सापेक्ष या परम्परागत हो और उसके मूल तत्व जीवित हांे सर्वांगीण लाभ देती है और खतरा नहीं है, जैसे विवाह के समय भावी वरवधू को उत्तेजित करना और उसे उत्तेजना पर संयम करना सिखाना लेकिन अगर संयम या उत्तेजना कोई एक हटा दिया जाय तो खतरा हो जाएगा।
रसायन के द्वारा किसी को नशे में डालकर उसे दिव्य अनुभूति के भ्रम में डालना जबकि असली विधि है- नशीले पदार्थो के सदुपयोग एवं नशे पर निमंत्रण की।
शरीर के संवेदनशील अंगों की जानकारी होने से दूसरे पर प्रहार, बेहोश करना, ठगना आदि।
सम्मोहन का इतना प्रयोग हुआ कि बिहार, बंगाल, उड़िसा में योगी से लोग इतने डरने लगे है कि बच्चों को फुसला लेगा, जवान औरत को भगा ले जाएगा।
कुछ संप्रदाय विधवा एवं झगड़ालु औरतों को ही पंसंद करते हैं उनके भी घर से भागने एवं शमशान में दारू पीने से बदनामी तो होगी ही। ये लोग क्रोध की साधना करते हैं। इससे डर भी पैदा होता है।
उपर्युक्त रूप से संक्षेप में मैं ने आप को साधना की विविध धाराओं की जानकारी दी। भारत में अभी भी इन सभी विधियों से साधना की जाती है। कुछ केन्द्रों या समूहों में प्रवेश सरल है कुछ में कठिन क्योंकि सबकी अपनी-अपनी शर्ते हैं।
मेरा सौभाग्य-संयोग है कि मैं लगभग सभी धाराओं के लोगों से परिचित हुआ। अब समाज में आधारित विधियों का संवर्धन और संरक्षण चाहता हूँ। साथ ही रहस्यों का अनावरण भी करना चाहता हूँ ताकि धोखेबाजी का खतरा न रहे।

पात्रता की स्वयं जाँच -

आप स्वयं जाँच करें कि आप होश हवास में अपने बल पर धीमी गति बढ़ना चाहेंगे या अपनी किसी पसंद के अनुरूप अपने को हरहाल में बदलेंगे या समाज/समूह एवं गुरू पर छोड़ने का खतरा मोल लेंगे तभी आपको अगली राय दी जा सकेगी।
परिवारिक संबंध -
पहली विधि व्यक्तिगत है। परिवार का विरोध न हो इतना ही काफी है। दूसरी में परिवार की पसंद-नापसंद से विरोध हो सकता है। तीसरी में तो कुछ समूहों में बिना पत्नी एवं कई जगह पुत्र-पुत्री के भी समर्थन सहायता के बगैर प्रवेश ही नहीं है।
जहाँ अत्यंत तीव्रता एवं कठोरता वाली साधना करनी हो तो वाम मार्गी नियम लागू होते हैं। यहाँ रक्तशुचिता, जन्मश्रेष्ठता एवं परिवारिक दायरे की संर्कीणता आरंभ में ही तोड़ी जाती है तभी प्रवेश मिलता है।
इनसे विलक्षण धारा मृत्यु के बाद साधना की है। इसकी आपको न जरूरत है न इस समय ऐसा कोई व्यक्ति मेरे संर्पक में है।

न्यास

भाई के.पी मधु जी ने न्यास के बारे में लिखा है और मुद्गल ऋषि के बारे में जानना चाहा है।
मुद्गल ऋषि एवं उनका गोत्र बहुत प्रसिद्ध हुआ। बाद में इसी गोत्र में मोग्गलान (मौद्गल्यायन) नामक एक बड़े वैयाकरण (Grammarian) हुए। उन्होंने पालि भाषा के लिए व्याकरण लिखा।
बुद्ध के जो प्रमुख अग्रणी शिष्य माने जाते हैं, जिन्हे बुद्ध के बाद धर्म का उपदेश करने का अधिकार मिला उनमें मोग्गलान एक है।
एक वर्णनात्मक संस्कृत कोश है - बृहद्वाचस्पत्यम्। यह संस्कृत में है। यहां से बहुत सारी जानकारी मिल सकती है। मेरे पास यह पुस्तक नहीं है। गया में ऐसी अच्छी लाइब्रेरी नहीं है। खरीद भी नहीं सकता। देखने के बाद विस्तार से बताऊँगा।
गीता के न्यास के विषय में -
न्यास को समझने के पहले भारतीय धर्म की मूल सामग्री (Components and Contents) को भी समझना पड़ेगा।
धर्म अर्थात स्वभाव (Natural Character), कर्त्तव्य (Duty, Worth to be done) व्यवस्था/विषय System and rule, प्रकृति एवं जीवन संबंधी समझ तथा आदर्श (Ideology) लक्ष्य (Goal) यह सबका मिला हुआ रूप है।
इसलिए धर्म ग्रन्थों में -
संसार, आदर्श, समाज व्यवस्था एवं जीवन के रहस्य सबकी चर्चा रहती है।

न्यास -

इससे पहले बताए गए संर्दभ में न्यास शरीर एवं मन के बीच के संबंध को अनुभव के धरातल पर समझाने अर्थात महसूस करने का प्रथम चरण है। यह एक ऐसा अभ्यास है जिससे शरीर में रहते हुए भी उसे तटस्थ दृष्टि से देखा जा सकता है। यह प्रायोगिक अधिक है यह Learning का मामला है केवल Understanding का नहीं है।

आश्चर्यजनक सत्य -

यह एक तकनीक है इसलिए गीता में वर्णित विषय से इसका कोई अनिवार्य संबंध नहीं है। गीता की जगह बायबिल या कुरान या फिल्म का गाना या गालियां कुछ भी उपयोग में लाई जा सकती हैं।
यह एक Indirect method of learning है। सारा रहस्य शरीर के अंगों को छूने के साथ के मानसिक अभ्यास एवं क्रमबद्धताsequance and harmony of sensation of different parts of the body and sensation generated by the effect में है।
आप न्यास भूल गये तो क्या हुआ? फिर से सीख सकते हैं किंतुmachanically practice करने से अनुभव नहीं होगा। ऐसे अभ्यासों में अंदर की बातें सिखाई जाती हैं बौद्धिक स्तर पर सीखनेवाले को प्रायः बताई नहीं जातीं। उच्च स्तरीय ग्रंथों में जहाँ विधियों की सार्थकता की चर्चा होती है You may consider it as a pedagogy वहाँ इन बातों की चर्चा होती है।

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