Friday, May 18, 2012

आम आदमी का दर्शन


आम आदमी का दर्शन - 2
आप ने पहला भाग पढ़ लिया। दूसरा आपके सामने है। आम आदमी समझता है कि पांच कोस पर पानी बदले सात कोस पर बानी अर्थात बोली। मतलब समाज, धरती एवं उसकी फसल में अंतर है, विभिन्नता है, अनेकता है। तब फिर इनमें एकता के सूत्र क्या हैं?
आज अगर आधुनिक ढंग से सांेचे तो कहेेंगे कि सभी मानव एक हैं। भारत का आम आदमी इसे नहीं मानता और क्यों माने? जीव मात्र एक हैं, चार लाख चौरासी हजार योनियों में पैदा होने एवं मरने तक की बात मान्य है। यह एकता है, पर राजा, लंपट, डकैत, हत्यारा, साधु, दुश्मन सबको एक कैसे मान लें? अपनी गाय, अपना कुत्ता तो सुख-दुख का साथी है, जो साथी नहीं वह अपना कैसे? कुछ मजबूरियाँ हैं, जैसे- रक्त संबंध, राज्य की सीमा, धर्म आदि। पता नहीं, इन्हे किसने बनाया। जहाँ तक हो सके मानो नहीं तो मन मानो। जीवन जीना और खुशी की तलाश करना जरूरी है। भीड़ सदैव सफल नहीं होती किंतु जो सुख कुछ ही लोगों को मिले वह क्या सच में चाहने लायक सुख है। सही सुख तो सच में वही जो संसार की पूरी भीड़ को मिल सके, नहीं तो वह तो खाश आदमी की खुशी का रास्ता हो गया। ज्ञान, प्रयोग, अविष्कार, नई चलन, परिष्कार, सुधार जो भी हों, आम आदमी सबको स्वीकार करता है पर अपनी शर्तों पर। उदाहरण के लिए घने जंगल के किसी भाग में ठंढे पानी की खोज खतरे का काम है, जो वीर हों जायें, ढूढें वो जाएँ, मर्जी हो बताएँ तो वे सर आँखों पर, न बताएँ तो उनके पिछे चुपके से हो लेंगे। अगर वीर न हों तो कहें कि वे वीर नहीं है, फिर मंडली बना कर ढू़ढंे़गे। कायर या सामान्य को वीर क्यों मानें?
मेरा छोटा भाई जो अब एक बड़े पद पर मैनेजर है मेरे गाँव में बेकार का डरपोक बालक माना जाता था। उसकी कोई सामाजिक हैसियत नहीं थी, न नदी में तैरना, न कुश्ती, न झगड़ा, न चोरी, न फुटबॉल, न कबड्डी, न पेड़ पर चढ़ना, ऐसा लड़का किस काम का, उसने खेती करना सीखा तो कुछ बात बनी। एक दिन उसने गाँव में चार पीढ़ियों से चर्चित एक आतंक मचाने वाले विशाल किंतु बूढ़े नागराज का वध कर दिया, जब उसकी जान पर बन आई। वह आत्मविश्वास से लबरेज हो गया और कंधे पर नागराज को लेकर गाँव के चौराहे पर आया, उससे अब कौन पंगा ले। मृत्यु का सामना किए बगैर वीरता कैसी? यही बात ज्ञान की है। जो सबके लिए जरूरी है और सामान्य है, उसे विद्या पर सबक होना ही चाहिए लेकिन जो किसी लंबे अभ्यास से सीखने की विद्या है वह किसी न किसी कुल परंपरा में ही रहे तो अच्छा। लोग लाभ उठाएँ और अपनी कमाई में से उसे भी दें, चाहे वह चिकित्सा हो, नाव खेना हो या शिल्पकारी।
भारत में भगवान का मामला भी समझना होगा। भगवान गलत नहीं होते लेकिन जब वे नर तन धारण करते हैं तो मनुष्य के गुण-अवगुण उनमें भी आ जाते हैं, कम या अधिक यह बात सबको मान्य है पर लोग डरते हैं, भगवान से भी और समाज से भी इसलिये आम तौर पर हर मामले में भगवान का नाम लेना ही काफी है। भगवान को शामिल करना नहीं।
आम आदमी छाती पीटकर पुक्का फाड़कर भी रोता है। औरतों को मौका-मुनासिब जब चाहे रोने का प्रशिक्षण दिया जाता है क्योंकि उन्हें मर्दो को अपनी कानी (कनिष्ठिका सबसे छोटी) ऊँगली पर मर्दों को नचाना होता है। उनके लिये रोना एक हििायार की तरह है। नटवर नागर कृष्ण के बारे में कवि रसखान लिखते हैं - ताहि अहिर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं। स्त्रियाँ जन्मजात सात्विक अमिनेत्रियाँ हैं। शास्त्रों में सात्विक अभिनय उसे माना गया है जहाँ अभिनेता को किरदार से अलग होने का बोध ही न हो और फिर अभिनय समाप्त होते ही अपने रूप मे आ जाए।
स्त्रियाँ प्रायः झूठ नहीं बोलतीं क्योंकि औरतों को आम तौर पर झूठ एवं सच का अंतर रखना पंसद नहीं है। जब कोई बात उनके मन के लायक हो। वे पूरे विश्वास के साथ झूठ को सच मान कर बोलती हैं कि शायद झूठ पकडद्यने वाली मशीन भी न पकड़ पाए।
शेष अगले पोस्ट में

Saturday, April 7, 2012

आम आदमी का दर्शन


आम आदमी का दर्शन 1
रवीन्द्र कुमार पाठक
            दर्शन एक क्रिया है जिसे मनुष्य जगे रहने पर प्रायः करता रहता है। आँख भी दो तरह की मानी गई - भीतरी और बाहरी। चलन और प्रधानता के कारण दर्शन से होने वाला ज्ञान अन्य ज्ञानों पर हावी होता चला गया। आँखवाला सुननेवाले, अनुभव करनेवाले, चलनेवाले एवं काम करनेवाले से श्रेष्ठ होता चला गया। आदमी बेवकूफी की ओर बढ़ गया।
            आँख की तुलना में अन्य चार इन्द्रियों की उपेक्षा हो गई। फिर अर्थ और सिकुड़े, दर्शन का अर्थ बदलता गया। बारीकी से देखना, विपश्यना, प्रेक्षा, अंतर्दर्शन आदि मन से किए जानेवाले कार्य एवं अनुभव दर्शन शब्द के अर्थ होते गए।
            आँख खोल कर देखने की अपनी जो भी सीमा हो आम आदमी उसे झुठलाता नकारता नहीं है।  आम आदमी ज्ञान एवं अनुभव के अन्य स्रोतों के साथ उसका सामंजस्य बनाने का प्रयास करता है। यह आम आदमी का दर्शन है।
            मनुष्य मात्र का अध्ययन करनेवाले नए शास्त्र को Anthropology /मानवविज्ञान/नृ-शास्त्र नाम से जाना जाता है। यह शास्त्र सायंस माना जाता है। मानवशास्त्र यह स्वीकार करता है कि हर समुदाय की अपनी Cosmology होती है। वह संपूर्ण अस्तित्व को अपनी समझ के अनुसार वर्गीकृत तथा व्याख्यायित करता रहता है। समाज में नए-पुराने का समावेश एवं लोप चलता रहता है और उसे स्वीकारने-हटाने को वह समुदाय अपनी दृष्टि से युक्तिसंगत ठहराता है। इस सहज प्रक्रिया को देखने से स्पष्ट है कि आम आदमी दर्शन का सृष्टिकर्ता, अनुभवी एवं परिष्कारक भी है।
भारत का आम आदमी अजीब हालात में रहता रहा है। उसे सदैव विविधता एवं विरोधों के बीच संगति बनानी पड़ती है। परिणामतः भारतीय आम आदमी का दर्शन क्षेत्रीय दृष्टि, संगति एवं समन्वय की विधि से विकसित दर्शन है। व्यक्ति, विचार एवं व्यवस्था ( धार्मिक/अर्थिक ) का आदान-प्रदान पूरे भारत में होता रहा है। कभी कष्मीर , कभी मगध , कभी नैमिषारण्य , कभी सौराष्ट्र और कभी नवद्वीप या तेलंगाना आदि में विकसित व्यवस्थाएँ सुदूर क्षेत्रों को प्रभावित करती रही हैं। बाद में बाहर से आए इस्लाम एवं ईसाइयत के साथ सामंजस्य की प्रक्रिया आज भी जारी है। मैंने मगध की सांस्कृतिक विरासतनामक पुस्तक में इनके कुछ नमूने संकलित किये हैं।
खेती करनेवाले किसान को जैन दर्शन अनुकूल नहीं पड़ता। कीट-पतंग खेती में मरेंगे ही। उनकी हिंसा होगी ही। अहिंसा का महत्त्व भी है ही। जैन एवं वैदिक विद्वान अपनी श्रेष्ठता के लिए लड़ते रहे। आम आदमी ने तय किया कि श्रेष्ठ तो अहिंसा ही रहेगी। बिना जुताई वाली नैसर्गिक फसल को किसी एक दिन के लिए अधिक पवित्र मान लेते हैं या इसी तरह का कोई दूसरा उपाय भी कर लेते हैं फिर भी किसान के द्वारा खेती में हुई हिंसा भौतिक हिंसा भले ही हो मानसिक हिंसा नहीं है क्योंकि खेती में उत्पादन उद्देश्य है, हिंसा नहीं। अनजाने हुए पाप की भरपाई दान-व्रत आदि से अर्जित पुण्य के द्वारा हो जाएगी। यही आम आदमी का दर्शन है। वह विशिष्ट वैष्य समाज की तरह यह ढांेग नहीं करना चाहता कि वाणिज्य-व्यवसाय अहिंसक आजीविका या आय का स्रोत है और खेती हिंसक है।
            सारे दर्शन विद्या की बात करते हैं और झगड़ते भी रहते हैं। क्या विद्वान होने के लिए झगड़ालु होना जरूरी है ? भारत के आम आदमी ने इसे समझा और जो लोग तत्त्वज्ञान की बारीकियों का झगड़ा छोड़ सबके भले की बात सोचें उन्हीं को आम आदमी के बीच प्रतिष्ठा मिली। बुद्ध ने ऐसे प्रश्नों को टाल दिया। अपने को कृषक एवं वैद्य घोषित किया तब जाकर उन्हें स्वीकृति मिली।
कुछ दिनों बाद त्रिपिटकों में बुद्धोपदेश संहिताबद्ध हो गया। ऊपर से क्षत्रियों की जन्म से ही श्रेष्ठता की मान्यता और उसमें भी शाक्यवंशियों का वर्चस्व बढ़ने लगा। आम आदमी ने समझ लिया कि झगड़ा  शुरू हो गया। मगध में बुद्ध की ऐतिहासिकता के विरूद्ध महायान शुरू हुआ। सभी को अपना-अपना बुद्ध मानने की सुविधा मिल गई। संकीर्णता वाले बुद्ध को केवल मुनि का दर्जा देकर पदावनत कर दिया गया। वे शाक्यमुनि बनकर सीमित हो गए।
            यह संसार ही भगवान हैइस मत से आम आदमी सुविधा महसूस करता है। कोई भी वह चाहे विशिष्ट व्यक्ति या शक्तिसंपन्न कुछ भी हो, चाहे वह जड़ हो, या चेतन देवता भी हो सकता है। इस महायान मत में अपना-अपना देवता गढ़ने की सुविधा है। उस देवता का स्वरूप, आकार जो चाहें जैसे रखें।
इस संसार को भगवान ने बनाया हैइस मत के साथ भी काम चल जाता है। इस मत को मानने पर भगवान तो गढ़ नहीं सकते तो इस्लाम मानने के बाद की तरह जिन्न-जिन्नात, पीर फकीर, दरवेश, चुडै़ल से काम चला लिया जाता है। मंदिर/मस्जिद पर आफत आये तो भगवान निराकार, मौका मिला तो साकार। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद गया में तबलीगी मत का बहुत बड़ा समागम हुआ। सारी आशंकाओं के बाद भी कोई गड़बड़ी नहीं हुई। मौलाना साहब से अखबारवालों ने पूछा कि बाबरी मस्जिद टूटने पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है? मौलाना साहब ने कहा - खुदा की मर्जी से जब तक था तब तक था। उसकी मर्जी नहीं रही सो टूट गया या तोड़ दिया गया। इसमें मुसलमानों को करना क्या है ? खुदा का घर, खुदा जानें।
            भारत का आम आदमी सुखवादी है। मगध के दलित समाज में जीउतियाएक महत्त्वपूर्ण उत्सव है। यह दुःख का पर्व है लेकिन दुख कितने दिन याद रहे। जीउतिया उत्सव हो गया। मुहर्रम भले ही उदासी का त्योहार हो, ताजिया का उत्साह देखते ही बनता है। क्या हिंदू क्या मुसलमान है तो हिंदुस्तानी दिल वाला।
            ये कुछ नमूने हैं कि आद आदमी कैसे सोचता और व्यवहार करता है।

            भारत में दर्शन की तीन मुख्य चिंताएँ हैं-
            क-औचित्य एवं संगति।
            ख-संसार का तात्त्विक एवं सूक्ष्मरूप, सृष्टि से प्रलय तक।
            ग-मन एवं सृष्टि की कार्य प्रणाली का ज्ञान।
उपर्युक्त तीनों चिंताएं केवल विद्वानों, साधकों या धर्माचार्यों की चिंता क्षेत्र के ही अंतर्गत नहीं आतीं। आम आदमी भी हर बार संवाद तथा प्रयोग के माध्यम से उनकी परीक्षा कर संशोधनों के साथ पुष्टि करता है या उन्हें अस्वीकार कर देता है।
वर्तमान के व्यवहार एवं कार्यक्रमों का अतीत तथा भविष्य से संगति मिलाना जरूरी होता है। यह दर्शन का ही क्षेत्र है। इस उद्देश्य से आम आदमी विविध मतों को आंशिक रूप से स्वीकार करता है यही विशिष्ट से उसका अंतर है। इसीलिए किसी एक संप्रदाय के मठ या राजनैतिक पार्टी में दूसरे मत का समावेश हो न हो किसी परिवार गांव या मुहल्ले में विविध मतों के लोग पर्याप्त मात्रा में मिल जा सकते हैं। भूमि , पशु , जल , वृक्ष-वनस्पति , अपने , पराए , जीवन , मृत्यु , मृत्यु के बाद , जन्म के पूर्व , ये सभी बातें आम आदमी की चिंता एवं चिंतन के विषय हैं। 
तत्त्वज्ञान के बारे में आम आदमी अपनी भूल सुधारता है और फंसता भी है। घर का जोगी जोगड़ा अन्य गांव का सिद्ध। एक नीचे वाली दुनिया है और दूसरी इसके ऊपर, ऊपर वाला है। यह आम आदमी का वर्गीकरण है। इस वर्गीकरण के अतिरिक्त अन्य वर्गीकरण विशिष्ट लोगों के हैं, आम आदमी का नहीं। बाकी वर्गीकरण इन्हीं दो के अवांतर विभाग हैं, तो जो भी हों, हुआ करें।
            तत्त्वचिंतन की दृष्टि से स्व-भाव और पर-भाव पर आम आदमी से चर्चा करते-करते थक जाएंगे फिर भी चर्चा पूरी नहीं होगी क्योंकि हरि अनंत हरि कथा अनंता।
            भारत में मन की कार्य प्रणाली भी आम आदमी की चिंता/चिंतन का विषय है। वह इन मामलों में पूरी रुचि लेता है। उदाहरण के लिए किसी का मन अकारण बेचैन होता है तो वह सोचता है मेरा कोई स्मरण कर रहा है। मानो तो देवता नहीं तो पत्थर, जाकी रही भावना जैसी हरि मूरत देखी तिन तैसी , मन माने का मेला नहीं तो सबसे भला अकेला , जाके पाँव न फटे बिवाई सो का जाने पीर पराई , हमारे हरि हारिल की लकड़ी , डुमरी के फूल , पढ़ पूत चन्द्रिका जा में चढ़े हंडिका , आपन हारल, मेहरी के मारल आदि अनेक वाक्य एवं वाक्यांश आम आदमी के दर्शन एवं चिंतन को सूत्र रूप में व्यक्त करते हैं।
            मनुष्य के पास ज्ञान के जो साधन हैं उनमें दृष्टि का बहुत महत्त्व है। हिन्दुस्तान में शब्दों का मायाजाल दूसरों को फंसाने के लिए बनाया जाता है। अगर आपके पास दृष्टि न हो तो क्या होगा ? मायावी व्यक्ति के शब्द जाल में आप फंस जाएंगे। जो बंधन में बंधा, जो फंसा उसका जीवन पशु के समान होता है। उसकी गरदन, कमर या नांक में रस्सी फंसा दी जाएगी। उसका उपयोग किया जायेगा या फिर भेंड बकरे की तरह रोंए, खाल से लेकर मांस तक सबका उपयोग विशेष व्यवसाय की दृष्टिवाला मनुष्य कर लेगा। इसलिए पाश/फाँस को जो व्यक्ति जाने वही ज्ञानी, देखनेवाला दªष्टा है और जो इससे निकल गया या फाँस को तोड़ डाला वह साधक या सिद्ध।
            आप भी जानते होंगे और आपके इलाके में कोई न कोई कहावत होगी कि चिकनी-चुपड़ी बातें करनेवाला और बातों में घुमानेवाला मनुष्य खतरनाक/धोखेबाज होता है। अतः आँखें खुली रखिए।
दृष्टि, दर्शन इन शब्दों का प्रयोग देखने की क्रिया एवं देखने के मूल साधन आँख दोनों के लिए होता है। ज्ञानार्जन में दृष्टि के महत्त्व के कारण संपूर्ण ज्ञानार्जन प्रक्रिया को ही दर्शन कहा गया। भारत में ज्ञान एवं दर्शन की बातें करने का अधिकार सबको रहा है। हर व्यक्ति के भीतर ज्ञानार्जन की अनंत संभावनाएँ मानी गई हैं। ज्ञान जो अनंत है उसकी उपलब्धि आँख, कान, नाक, चमड़ी सभी से हो रही है फिर भी देखने एवं सुनने में सर्वाधिक ऊर्जा लगती है और इसलिए इन दोनों का महत्त्व है। देखना भी दो तरह का हो सकता है-
(क)- वह देखना जो दिखाई दे रहा हो और
(ख)- अपनी या किसी दूसरी की पसंद से देखना।
आम आदमी को आँख खोलने पर प्रकृति के नजारे दिखाई पड़ते हैं। सूरज , चाँद , तारे , धरती , आसमान , मरना-जीना , बीमारी , नदियाँ , पहाड़ , समुद्र , बडे-छोटे पौधे , जानवर , तितली , बाढ़ , महामारी और पता नहीं ऐसी कितनी चीजें उसे दिखाई पड़ जाती हैं। यह सब उसके चारो ओर होते है। चूँकि दिल-दिमाग उसके पास है तो वह बहुत कुछ जान लेता है और अपनी जरूरत तथा पसंद के आधार पर बहुत कुछ मान भी लेता है। यह जानने-मानने की प्रक्रिया सतत् चलती रहती है। यह ज्ञान ही आम आदमी का दर्शन है। इसी के बल पर उसकी जिंदगी चलती है। आम आदमी के दर्शन का कोई पूर्व निर्धारित लक्ष्य या दिशा नहीं होती। ऐसा होते ही वह आदमी आम से खाश हो जाता है। इसलिए आम आदमी का दर्शन व्यापक एवं अनंत संभावनाओं वाला होता है। इस विपुलता एवं संपन्नता से खाश आदमी को बहुत जलन होती है।
सामान्य मनुष्य विशिष्ट मनुष्य
साधारणतः सभी आदमी साधारण आदमी ही होते हैं। उनकी जिंदगी की हालातें भी साधारण होती हैं किंतु लगभग हर आदमी में विशिष्ट बनने की पैदाइशी दिली बीमारी रहती है, जो बड़ा होने के साथ बढ़ती जाती है। यह बीमारी अगर आम आदमी की बुनियादी बातों की सीमा में रहती है तो निबाह हो जाता है लेकिन जब यह बहुत अधिक बढ़ने लगती है तो वह बीमार आदमी अपने एवं दूसरे दोनों के लिए बहुत घातक हो जाती है । कभी-कभी किसी देश या काल-खंड में यह बीमारी संक्रामक रोग की तरह विकसित हो जाती है तब यह महामारी की तरह भयानक विनाश करती है। इससे युद्ध जैसी घटनाएँ तो होती ही हैं जो प्रगट दिखाई देती हैं। कभी-कभी लोगों को यह घुन की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी भीतर ही भीतर खाने लगती है।
आम आदमी भर पेट खाता है। जैसा पेट, वैसा भोजन। हमारे इलाके के लाला लोग (कायस्थ, जमींदार) भर पेट केवल माँस-मछली खाते थे। दारू पीते कम थे, उसमें स्नान अधिक करते थे लेकिन जहाँ तक रोटी की बात है विशिष्ट आदमी होने के नाते उनका आदर्श था ‘‘एक रोटी बस, लाला हैं कि पस ’’, पस माने पशु। लालाजी की नजर में भर पेट रोटी तो जानवर खाता है।
            आम आदमी ठहाका लगाकर हँसता है , रोता है , गाता है , चीखता- चिल्लाता गाली देता है , मारपीट करता है और फिर उसी से दोस्ती भी कर लेता है। विशिष्ट आदमी चैता, होली की मंडली में गाने, नाचने में बेइज्ज्ती महसूस करता है। वह बाई जी का गाना सुनता है, नाचता नहीं, नचाता है।
आम आदमी दोनों आँखों से गरदन घुमाकर चारो तरफ देखता है। एक तरफ देखने से वह आश्वस्त नहीं हो पाता। खास आदमी एक आँख मूँदकर दूरबीन से तारे देखता रहता है और उसे पड़ोसी का घर दिखाई नहीं देता, न बीमार बूढ़ा बाप, न खूबसूरत हसीना। उसे अपनी आँख से अधिक दूरबीन पर भरोसा होता है और पड़ोस का बच्चा दूरबीन से देखने पर दिखाई ही नहीं देता तो दूरबीन वाला पहाड़ पर चढ़कर बच्चे को देखता है। ऐसे अनेक मामले हो सकते हैं।
            आजकल संपत्ति को लेकर चिंताएँ अधिक हैं। इसी कारण संपत्ति के दर्शन बनाए जा रहे हैं। आम आदमी आसानी से देखता महसूस करता है कि जो व्यक्ति घूम-घूमकर दूर की संपत्ति देख पाता है उसकी लालच उतनी ही बड़ी होती है। आम आदमी को बचपन में चाँद की परछाईं पकड़ने की इच्छा होती थी किंतु वह अपने अनुभव से जान जाता था कि यह तो बचकानापन है। विशिष्ट आदमी चाँद पर कॉलोनी बसाना चाहता है। इसके लिए बड़ी मशीन चाहिए और बड़ी मशीन के लिए बहुत इंधन चाहिए क्योंकि मशीन बहुत अधिक तेल पीती है तो तेलवाले मुल्कों पर कब्जा चाहिए। इस प्रकार यह साफ है कि आम आदमी का दर्शन जीने का दर्शन है। अपने परिवेश के साथ संपूर्णता में जीना उसे परंपरा से प्राप्त सहज लक्ष्य है और इसके पक्ष में उसका दर्शन है जो उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी अनुभव पर आधारित है।
आम आदमी जानता है कि जर, जोरू और जमीन को लेकर झगड़े होते हैं। साथ ही यह भी जानता है कि संपत्ति संबंधी नियम देश-देश में बदलते रहते हैं। अतः उसे अपनी बेटी को समझाना पड़ता है कि ससुराल का कायदा कानून समझ लेना क्योंकि तुम्हारी शादी परदेश में हो रही है। अपने देश में झंझट होगी तो पंचायत के बल पर निपट ही लेंगे। भारत में हिन्दू उत्तराधिकार नियम के बाद भी अपवाद छोड़कर बेटी भाई से हिस्सा माँगती ही नहीं। उसे स्पष्ट है कि यह कैसे होगा कि दोनों जगह हिस्सा मिलेगा और मैके में जिंदगी भर रूतबा भी चलेगा?
आम औरत तभी अपने को औरत महसूस करती है जब माँ बन लेती है। बाँझ को पूरी औरत का दर्जा नहीं है क्योंकि इसी मामले में वह मर्द से अधिक है क्योंकि कोई भी, कितना भी ताकतवर मर्द बाप के पेट से नहीं पैदा होता ?
आजकल आम आदमी का दर्शन खतरे में है। यह पहली बार नहीं है। पहले भी ऐसा होता रहा है। आम आदमी फिर भी रास्ता निकालता है इस बार भी निकालेगा ऐसी उम्मीद है।
            आम आदमी को मालूम है कि तीन कोस पर पानी बदले पाँच कोस पर बानी

Friday, April 6, 2012

लोक मंगल पर अनुरोध

लोक मंगल पर अनुरोध -

इस ब्लाग पर विचारणीय बिंदुओं को चयनित करने का काम अभी भी रुका हुआ है। मौन के समय पहले दिन भाई वागीश जी ने जो लिखा था वह मैं भूल गया हूँ। उन्हे अपनी याददास्त से निकाल कर जोड़ना चाहिए।
पहला प्रश्न यही है कि लोक मंगल से हम क्या समझते हैं? इस बिंदु पर बात की जाय तो फिर हम आगे बढं।

मेरी समझ से -

सभी मनुष्य सुखी रहना चाहते हैं। यह सुख शारीरिक एवं मानसिक (भावना एवं बुद्धि ज्ञान आदि से संबंधित) दोनों का मिलजुला रूप होता है। कहीं शारीरिक तो कही मानसिक पक्ष की   प्रधानता होती है।
सुख का विरोध या अभाव दुख है। इसे लोग पसंद नहीं करते।
सुख की कमी एवं प्रतिकूलता दो मुख्य कारण हैं। ये दोनों ही कारण एक सीमा तक प्राकृतिक हैं। उसके बाद स्वयं मानव के विभिन्न संगठनों/संस्थाओं या परम्पराओं द्वारा उत्पादित एवं संरक्षित हैं। किसी एक ही पक्ष पर आधारित विचार अतिवादी हो जाता है।
इस स्थिति में प्रश्न यह है कि -
1.    वर्त्तमान परिस्थिस्ति में क्या करें कि मानव अधिक से अधिक सुखी रहे और     उसके दुख कम हो ?
2.    पूर्ववर्ती एवं वर्तमान उपाय आज कहाँ तक संगत हैं?
3.    मनुष्य एवं पकृति तथा व्यक्ति एवं समाज राज्य/धर्म/बाजार के बीच की उलझनें क्या हैं और उन्हे कैसे सुलझाएं ?
ऐसा और वर्गीकरण भी हो सकता हैं। उदाहरण के लिये भारत में सुख को दो पंकारों में रखा गया, 1 इस जीव लोक का सुख और 2 पर लोक का सुख।
इस जीव लोक का सुख अर्थात्-
अर्थागमो नित्यम् अरोगिता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च।
वश्यश्च पुत्रो अर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन।।
हे राजन् इस जीवलोक में छे सुख हैं - 1 अर्थ का आगमन, 2 सदैव निरोग रहना, 3 पत्नी का प्रिया प्रेमिका होना या प्रेमिका का पत्नी होना, 4 और उसका प्रिय वचन बोलने वाला होना, 5 पुत्र का अपने वश में होना, 6 विद्या का अर्थकरी होना मतलब आमदनी कराने वाली होना।
यह एक नमूना है। आपलोग भी तो उतरिए।

भाई वागीश जी ने मोबाइल पर हुई चर्चा में पूछा और भाई मधु जी ने ब्लाग पर विचार डाले। मैं भी देख रहा हूं कि बात आगे बढ़ नही रही अतः अपने विचार एवं व्यक्त विचारों अर अपनी समझ प्रस्तुत कर रहा हूं। रवीन्द्र कुमार पाठक

ध्यान क्या है? ध्यान की कौन सी विधि अपनाएँ?

आजकल ध्यान के अनेक प्रकार समाज में प्रचिलित हैं तब अनजान व्यक्ति के मन में यह सहज प्रश्न उठता ही है कि अगर उसे ध्यान करना हो तो वह किस विधि से करे?
कहाँ से सीखे? क्या सही है, क्या गलत?

ध्यान का मतलब -

ध्यान शब्द का कई अर्थों में प्रयोग होता है, और इस मानसिक अभ्यास की अनेक विधियां हैं,  जैसे- एकाग्रता, तटस्थता, कल्पना, चिंता आदि।
ध्यान की विधियां अपनी पद्धति की बनावट एवं लक्ष्य की दृष्टि से मुख्यतः निम्न प्रकार की हैं- इससे आपको चयन करने में सुविधा होगी। मैं ने केवल वास्तविक विधियों का वर्गीकरण किया है, जो प्रचालित ठगी है, उसका क्या वर्गीकरण?

प्रमुख विधियाँ -

तटस्थता प्रधान - शरीर एवं मन में होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया, संवेदना चेतना आदि का तटस्थ भाव से अवलोकन करना एवं उन्हे सजगतापूर्वक महसूस करना। अपनी ओर से चयन एवं संकल्प की जगह तटस्थ रहना, जो हो रहा है, उसे होने देना।
इनमें तटस्थता मुख्य है, कभी-कभी अधिक उद्वेग या आलस्य, नींद आदि आने पर उन्हे दूर करने का प्रयास भी किया जाता है -
इसके अन्तर्गत विपश्यना (बौद्ध परमपरा की थेरवाद पालि परम्परा) प्रेक्षा ध्यान (जैन परम्परा) एवं पतंजलि की योग परम्परा की विधियाँ आती हैं।
लक्ष्य -    शरीर एवं मन के संबंधों एवं मन की कार्यप्रणाली का ज्ञान। तटस्थता की दक्षता

एकाग्रता एवं रूपांतरण प्रधान -

चंचल मन को किसी व्यक्ति, बिंब  ध्वनि के प्रति पूरी तरह संवेदनशील एवं एकाग्र बनाकर अपने होने के भान को भी उसी में विलीन कर देना या तादात्म्य बना लेना। इसमें तटस्थता की जगह भावनात्मक लगाव एवं एकाग्रता विकसित की जाती है। यह भक्तिमार्गी श्रद्धामूलक दृष्टिकोण है।
लक्ष्य -    इष्ट अर्थात प्रिय/प्रिया के साथ तादात्मय की अनूमति एवं प्राकृतिक शक्तियों के साथ तादात्म्य स्थापित करने पर सूक्ष्म ध्वनि,संवेदना आदि को महसूस करने तथा उस आधार पर किसी दूसरें मानव या अन्य जीव को सूक्ष्म स्तर पर प्रभावित करने की क्षमता, ंगीत, चित्रकला वाद-विवाद की दक्षता, याददाश्त मजबूत करना आदि। वैदिक भक्तिमार्ग सगुण उपासना, योगवाशिष्ठ धारा एवं बौद्ध माहायान संप्रदाय की विधियों में इसी दृष्टि की प्रधानता रहती है।

 मिश्रित विधियों वाली हठयोग एवं तंत्र की धारा -

पूर्व वर्णित दो धाराओं के समानांतर कुछ लोगों ने सोचा कि किसी एक ही दृष्टिकोण का अनुसरण क्यों करें? मन एवं प्रकृति के बीच अनेक प्रकार के संबंध हैं। अपने काम एवं सामर्थ्य के अनुरूप विधि किसी भी ज्ञानी गुरु के माध्यम से सीख लेनी चाहिए, चाहे वह शरीर की कार्यप्रणाली संबंधी हो, औषधियों का प्रभाव हटाने की हो या शीघ्रता से ध्यान में सफलता के लिए सामाजिक समन्वय की हो, रंग ध्वनि, खाद्य सामग्री द्वारा मन को प्रभावित करने की हो या पशु-पंक्षियों जैसी सूक्ष्म आवाज निकालने की हो।
सबसे मजेदार बात यह कि दुनिया के हर खूँखार जानवर, जैसे नाग, शेर, हाथी, घड़ियाल से दोस्ती करना हो या अपने भीतर की खतरनाक मानी जाने वाली प्रवृतियों को सबसे खतरनाक स्तर पर उभार कर उस पर नियंत्रण पाने की हो अभ्यास की विधियां मौलिक रूप से एक ही तरह की होती हैं, जैसे संसार को ही नहीं संसार को नष्ट करने वाले यम को भी नष्ट करने वाले क्रोध का अभ्यास, संपूर्ण संसार से प्रेम, कामोतेजना के चरम पर घंटों नहीं महीनों रहने का अभ्यास आदि।
जो साधना अकेले करने में, अनुभव तक पहूँचाने में 10, 20 साल लगे वहाँ, उस अनुभव तक  महीने भर में समाज के सहयोग से पहूँचना आदि।
इय धारा में इतनी विविधता और विचित्रता है कि विधियों का चयन एवं अभ्यास या तो कुल परम्परा से होता आ रहा था या गुरू स्वयं शिष्य के अनुरूप विधि का चयन करते थे।
हर क्षेत्र के लोग एक न्यूनतम स्तर तक विधियों का ज्ञान सबके लिए अनिवार्य मानते थे और इतना जबरन भी सिखाया जाता रहा। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी भी विधि की निंदा नहीं करता जबतक वह अपनी नैतिक संहिता से बंधी रहे, जब तक कोई विधि अपनी परम्परा की नैतिकता छोड़कर सुविधा या दिखावा का मार्ग न गढ़ ले।
चूँकि इस शिक्षण में परोक्ष विधियों का उपयोग अधिक होता है अतः धोखेबाजी की शिकायत बनी रहती है।

खतरे -

पहली विधि से -
तटस्थता अगर गहरी नहीं हो, अपने मन की, सुख-दुख की भावना से भी तटस्थत रहने का अभ्यास न हो, केवल सामान्य अनुभूतियों से तटस्थता पलायनवादी प्रवृत्ति में बदल जाती है और दूसरों की समस्या के प्रति असंवेदनशीलता एवं बाहरी तौर पर प्रतिक्रिया करने में ढ़ांेग करने में खूब सहायक होती है। यह ऊपरी सफाई शिष्टाचार तक ही सीमित रह गई। ऐसा आदमी भावुक लोगों को मूर्ख मानता है। यह व्यक्ति प्रधान साधना है। इसमंे समाज नहीं हैं।
दूसरी विधि से -
इससे भावनाएँ किसी एक तरफ बहुत अधिक केन्द्रित की जाती हैं। ध्यान में इष्ट या आलंबन अगर समाज या कोई व्यापक लक्ष्य नहीं हो तो संर्कीणता एवं सांप्रदायिक कट्टरता विकसित होती है। मनुष्य नए ज्ञान के प्रति अत्यंत विरोधी एवं प्रतिक्रियावादी हो जाता है। इस विधि से मानव प्रतिक्रियावादी हो जाता है’.। इस विधि से .मानवबम की तरह मनुष्य विष्फोटक हो जाता है। इस विधि से सघन आत्मीयता और संगठन भावना का विकास तो होता है पर कई बार तीव्र घृणा  और असहिष्णुता भी विकसित होती है। फिर भी तीन चार तरह के आलंबनों पर ध्यान के अभ्यास से मनुष्य समझदार हो जाता है कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। तब उपर्युक्त समस्याएं नहीं रहतीं।
तीसरी विधि -
यह विधि जहाँ तक समाज सापेक्ष या परम्परागत हो और उसके मूल तत्व जीवित हांे सर्वांगीण लाभ देती है और खतरा नहीं है, जैसे विवाह के समय भावी वरवधू को उत्तेजित करना और उसे उत्तेजना पर संयम करना सिखाना लेकिन अगर संयम या उत्तेजना कोई एक हटा दिया जाय तो खतरा हो जाएगा।
रसायन के द्वारा किसी को नशे में डालकर उसे दिव्य अनुभूति के भ्रम में डालना जबकि असली विधि है- नशीले पदार्थो के सदुपयोग एवं नशे पर निमंत्रण की।
शरीर के संवेदनशील अंगों की जानकारी होने से दूसरे पर प्रहार, बेहोश करना, ठगना आदि।
सम्मोहन का इतना प्रयोग हुआ कि बिहार, बंगाल, उड़िसा में योगी से लोग इतने डरने लगे है कि बच्चों को फुसला लेगा, जवान औरत को भगा ले जाएगा।
कुछ संप्रदाय विधवा एवं झगड़ालु औरतों को ही पंसंद करते हैं उनके भी घर से भागने एवं शमशान में दारू पीने से बदनामी तो होगी ही। ये लोग क्रोध की साधना करते हैं। इससे डर भी पैदा होता है।
उपर्युक्त रूप से संक्षेप में मैं ने आप को साधना की विविध धाराओं की जानकारी दी। भारत में अभी भी इन सभी विधियों से साधना की जाती है। कुछ केन्द्रों या समूहों में प्रवेश सरल है कुछ में कठिन क्योंकि सबकी अपनी-अपनी शर्ते हैं।
मेरा सौभाग्य-संयोग है कि मैं लगभग सभी धाराओं के लोगों से परिचित हुआ। अब समाज में आधारित विधियों का संवर्धन और संरक्षण चाहता हूँ। साथ ही रहस्यों का अनावरण भी करना चाहता हूँ ताकि धोखेबाजी का खतरा न रहे।

पात्रता की स्वयं जाँच -

आप स्वयं जाँच करें कि आप होश हवास में अपने बल पर धीमी गति बढ़ना चाहेंगे या अपनी किसी पसंद के अनुरूप अपने को हरहाल में बदलेंगे या समाज/समूह एवं गुरू पर छोड़ने का खतरा मोल लेंगे तभी आपको अगली राय दी जा सकेगी।
परिवारिक संबंध -
पहली विधि व्यक्तिगत है। परिवार का विरोध न हो इतना ही काफी है। दूसरी में परिवार की पसंद-नापसंद से विरोध हो सकता है। तीसरी में तो कुछ समूहों में बिना पत्नी एवं कई जगह पुत्र-पुत्री के भी समर्थन सहायता के बगैर प्रवेश ही नहीं है।
जहाँ अत्यंत तीव्रता एवं कठोरता वाली साधना करनी हो तो वाम मार्गी नियम लागू होते हैं। यहाँ रक्तशुचिता, जन्मश्रेष्ठता एवं परिवारिक दायरे की संर्कीणता आरंभ में ही तोड़ी जाती है तभी प्रवेश मिलता है।
इनसे विलक्षण धारा मृत्यु के बाद साधना की है। इसकी आपको न जरूरत है न इस समय ऐसा कोई व्यक्ति मेरे संर्पक में है।

न्यास

भाई के.पी मधु जी ने न्यास के बारे में लिखा है और मुद्गल ऋषि के बारे में जानना चाहा है।
मुद्गल ऋषि एवं उनका गोत्र बहुत प्रसिद्ध हुआ। बाद में इसी गोत्र में मोग्गलान (मौद्गल्यायन) नामक एक बड़े वैयाकरण (Grammarian) हुए। उन्होंने पालि भाषा के लिए व्याकरण लिखा।
बुद्ध के जो प्रमुख अग्रणी शिष्य माने जाते हैं, जिन्हे बुद्ध के बाद धर्म का उपदेश करने का अधिकार मिला उनमें मोग्गलान एक है।
एक वर्णनात्मक संस्कृत कोश है - बृहद्वाचस्पत्यम्। यह संस्कृत में है। यहां से बहुत सारी जानकारी मिल सकती है। मेरे पास यह पुस्तक नहीं है। गया में ऐसी अच्छी लाइब्रेरी नहीं है। खरीद भी नहीं सकता। देखने के बाद विस्तार से बताऊँगा।
गीता के न्यास के विषय में -
न्यास को समझने के पहले भारतीय धर्म की मूल सामग्री (Components and Contents) को भी समझना पड़ेगा।
धर्म अर्थात स्वभाव (Natural Character), कर्त्तव्य (Duty, Worth to be done) व्यवस्था/विषय System and rule, प्रकृति एवं जीवन संबंधी समझ तथा आदर्श (Ideology) लक्ष्य (Goal) यह सबका मिला हुआ रूप है।
इसलिए धर्म ग्रन्थों में -
संसार, आदर्श, समाज व्यवस्था एवं जीवन के रहस्य सबकी चर्चा रहती है।

न्यास -

इससे पहले बताए गए संर्दभ में न्यास शरीर एवं मन के बीच के संबंध को अनुभव के धरातल पर समझाने अर्थात महसूस करने का प्रथम चरण है। यह एक ऐसा अभ्यास है जिससे शरीर में रहते हुए भी उसे तटस्थ दृष्टि से देखा जा सकता है। यह प्रायोगिक अधिक है यह Learning का मामला है केवल Understanding का नहीं है।

आश्चर्यजनक सत्य -

यह एक तकनीक है इसलिए गीता में वर्णित विषय से इसका कोई अनिवार्य संबंध नहीं है। गीता की जगह बायबिल या कुरान या फिल्म का गाना या गालियां कुछ भी उपयोग में लाई जा सकती हैं।
यह एक Indirect method of learning है। सारा रहस्य शरीर के अंगों को छूने के साथ के मानसिक अभ्यास एवं क्रमबद्धताsequance and harmony of sensation of different parts of the body and sensation generated by the effect में है।
आप न्यास भूल गये तो क्या हुआ? फिर से सीख सकते हैं किंतुmachanically practice करने से अनुभव नहीं होगा। ऐसे अभ्यासों में अंदर की बातें सिखाई जाती हैं बौद्धिक स्तर पर सीखनेवाले को प्रायः बताई नहीं जातीं। उच्च स्तरीय ग्रंथों में जहाँ विधियों की सार्थकता की चर्चा होती है You may consider it as a pedagogy वहाँ इन बातों की चर्चा होती है।