Friday, May 18, 2012

आम आदमी का दर्शन


आम आदमी का दर्शन - 2
आप ने पहला भाग पढ़ लिया। दूसरा आपके सामने है। आम आदमी समझता है कि पांच कोस पर पानी बदले सात कोस पर बानी अर्थात बोली। मतलब समाज, धरती एवं उसकी फसल में अंतर है, विभिन्नता है, अनेकता है। तब फिर इनमें एकता के सूत्र क्या हैं?
आज अगर आधुनिक ढंग से सांेचे तो कहेेंगे कि सभी मानव एक हैं। भारत का आम आदमी इसे नहीं मानता और क्यों माने? जीव मात्र एक हैं, चार लाख चौरासी हजार योनियों में पैदा होने एवं मरने तक की बात मान्य है। यह एकता है, पर राजा, लंपट, डकैत, हत्यारा, साधु, दुश्मन सबको एक कैसे मान लें? अपनी गाय, अपना कुत्ता तो सुख-दुख का साथी है, जो साथी नहीं वह अपना कैसे? कुछ मजबूरियाँ हैं, जैसे- रक्त संबंध, राज्य की सीमा, धर्म आदि। पता नहीं, इन्हे किसने बनाया। जहाँ तक हो सके मानो नहीं तो मन मानो। जीवन जीना और खुशी की तलाश करना जरूरी है। भीड़ सदैव सफल नहीं होती किंतु जो सुख कुछ ही लोगों को मिले वह क्या सच में चाहने लायक सुख है। सही सुख तो सच में वही जो संसार की पूरी भीड़ को मिल सके, नहीं तो वह तो खाश आदमी की खुशी का रास्ता हो गया। ज्ञान, प्रयोग, अविष्कार, नई चलन, परिष्कार, सुधार जो भी हों, आम आदमी सबको स्वीकार करता है पर अपनी शर्तों पर। उदाहरण के लिए घने जंगल के किसी भाग में ठंढे पानी की खोज खतरे का काम है, जो वीर हों जायें, ढूढें वो जाएँ, मर्जी हो बताएँ तो वे सर आँखों पर, न बताएँ तो उनके पिछे चुपके से हो लेंगे। अगर वीर न हों तो कहें कि वे वीर नहीं है, फिर मंडली बना कर ढू़ढंे़गे। कायर या सामान्य को वीर क्यों मानें?
मेरा छोटा भाई जो अब एक बड़े पद पर मैनेजर है मेरे गाँव में बेकार का डरपोक बालक माना जाता था। उसकी कोई सामाजिक हैसियत नहीं थी, न नदी में तैरना, न कुश्ती, न झगड़ा, न चोरी, न फुटबॉल, न कबड्डी, न पेड़ पर चढ़ना, ऐसा लड़का किस काम का, उसने खेती करना सीखा तो कुछ बात बनी। एक दिन उसने गाँव में चार पीढ़ियों से चर्चित एक आतंक मचाने वाले विशाल किंतु बूढ़े नागराज का वध कर दिया, जब उसकी जान पर बन आई। वह आत्मविश्वास से लबरेज हो गया और कंधे पर नागराज को लेकर गाँव के चौराहे पर आया, उससे अब कौन पंगा ले। मृत्यु का सामना किए बगैर वीरता कैसी? यही बात ज्ञान की है। जो सबके लिए जरूरी है और सामान्य है, उसे विद्या पर सबक होना ही चाहिए लेकिन जो किसी लंबे अभ्यास से सीखने की विद्या है वह किसी न किसी कुल परंपरा में ही रहे तो अच्छा। लोग लाभ उठाएँ और अपनी कमाई में से उसे भी दें, चाहे वह चिकित्सा हो, नाव खेना हो या शिल्पकारी।
भारत में भगवान का मामला भी समझना होगा। भगवान गलत नहीं होते लेकिन जब वे नर तन धारण करते हैं तो मनुष्य के गुण-अवगुण उनमें भी आ जाते हैं, कम या अधिक यह बात सबको मान्य है पर लोग डरते हैं, भगवान से भी और समाज से भी इसलिये आम तौर पर हर मामले में भगवान का नाम लेना ही काफी है। भगवान को शामिल करना नहीं।
आम आदमी छाती पीटकर पुक्का फाड़कर भी रोता है। औरतों को मौका-मुनासिब जब चाहे रोने का प्रशिक्षण दिया जाता है क्योंकि उन्हें मर्दो को अपनी कानी (कनिष्ठिका सबसे छोटी) ऊँगली पर मर्दों को नचाना होता है। उनके लिये रोना एक हििायार की तरह है। नटवर नागर कृष्ण के बारे में कवि रसखान लिखते हैं - ताहि अहिर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं। स्त्रियाँ जन्मजात सात्विक अमिनेत्रियाँ हैं। शास्त्रों में सात्विक अभिनय उसे माना गया है जहाँ अभिनेता को किरदार से अलग होने का बोध ही न हो और फिर अभिनय समाप्त होते ही अपने रूप मे आ जाए।
स्त्रियाँ प्रायः झूठ नहीं बोलतीं क्योंकि औरतों को आम तौर पर झूठ एवं सच का अंतर रखना पंसद नहीं है। जब कोई बात उनके मन के लायक हो। वे पूरे विश्वास के साथ झूठ को सच मान कर बोलती हैं कि शायद झूठ पकडद्यने वाली मशीन भी न पकड़ पाए।
शेष अगले पोस्ट में

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